Saturday, November 21, 2009

chupke chupke

कौन  हूँ  मैं , न  जानू,
सूखी  रेत  या  कोई  ढेर  मिटटी  का ,
या  आशिक  इन  लहरों  का ,
घुलना  चाहा मगर  घुल  न  सका ,
बस  भीग  कर  रह  गया ,
बहना  चाहा  पर  बह  न  सका ,
फिर  किनारे  पर  ही  आ  लगा ,
फिर  बैठा  हूँ  रंग  बदलके  आज ,
क्या  पता  कोई  लहर  मुझको  डुबो  दे ,
ये  पत्थर  है  न ,
कितना  खुशनसीब  है ,
ताकता  है  समुन्दर  को  और  खेलता  है  लरजती  हवाओं  से ,
सुना  मैंने  भी  आज  पानी  को  करते  हुए  शिकायत ,
की  छेड़ता  है  लहरों  को  हर  रात  ये  भी  चुपके  चुपके ...