कौन हूँ मैं , न जानू,
सूखी रेत या कोई ढेर मिटटी का ,
या आशिक इन लहरों का ,
घुलना चाहा मगर घुल न सका ,
बस भीग कर रह गया ,
बहना चाहा पर बह न सका ,
फिर किनारे पर ही आ लगा ,
फिर बैठा हूँ रंग बदलके आज ,
क्या पता कोई लहर मुझको डुबो दे ,
ये पत्थर है न ,
कितना खुशनसीब है ,
ताकता है समुन्दर को और खेलता है लरजती हवाओं से ,
सुना मैंने भी आज पानी को करते हुए शिकायत ,
की छेड़ता है लहरों को हर रात ये भी चुपके चुपके ...
1 comment:
awesome
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