कह दूं क्या आज उसे ,
इसी उल्झान में दिन निकल जाते हैं ,
फिर ढलती शाम में हर तरफ अक्स उसके नज़र आते हैं ,
रात गुजरती है जैसे तैसे ,
और फिर नए दिन में तलाशते हैं नए सवाल ,
कैसे तुम मुस्कुराती आँखों से बिना पूछे हर सवाल का जवाब दे जाते हो ,
कल सुबह से अलग से हैं मिजाज ,
एक फूल तुझसे टकरा कर गिरा था जो ,
वो मुझे मिल जो गया है ...
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