जी चाहता है झगड़ लूं सूरज से ,
की न जा आज सोने और जगा रहे ये भी सारी रात ,
की हूँ मैं आशिक चांदनी का ,
और रातभर ये चाँद करता है बदनाम मुझे ,
कल जो उसे कोसा तो बादलो ने भी सिफारिश की ,
और तब से छुपा लेते हैं उसे ,
और दीवाना मैं रह जाता हूँ दूंदता, चांदनी के निशान,
हाँ कभी कोई तारा इशारा करता है , मगर डर डर कर ,
देखो उसको भी दर्द आया मेरी हालत पर ,
और अभी तक शायद जाना नहीं तुमने ,
ये ओस की बूंदे नहीं बिखरी होती हर जगह हर सुबह ,
ये आंसू हैं चांदनी के जो वो मेरे लिए बहती है ...
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