One of these days I read one of the immortal works of great Harivansh Rai Bachchan Ji the "Madhushala".
Madhushala , an amazing and intoxicating creation , just penned down a few lines as a tribute to great Bachchan ji and Madhushala...
***
ना जानू में गाँठ उम्र की,
बस अब जानू मैं हाला,
ना कोई और है बंधन,
हाथो में है प्याला,
साकी मिला मुझे भी,
बस अब दे दो हाला,
कितना खुशनसीब हूँ मैं,
पहुँच ही गया मधुशाला..
***
साकी है जब पास अब,
मैं भी ले लूं हाला,
मंज़ लूं खुद को,
और बना लूं प्याला,
फिर शायद ना मिले,
ये साकी , ये हाला,
रंग लूं खूब आज,
बड़ी रंगीली मधुशाला...
***
हाँ हूँ में प्यासा,
दे दो मुझे जी भर हाला,
प्यासा हलक,आतुर हैं अधर,
हाथ में काँपे ये प्याला,
साकी ना कतराना तुम,
गर बहक गया पीनेवाला,
हो तरसा या हो प्यासा,
सबको बहलाती मधुशाला..
***
अंधेरो रास्तो पे अब तक,
मैंने ढूँढी थी हाला,
कहाँ मिलेगा मेरा साकी,
कहाँ है प्रिये प्याला,
अब ना दौर थमेगा,
चलेगा, जब तक जीवन- प्याला,
भटके पथिको को,
पथ दिखालती रोशन मधुशाला...
***
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