Sunday, January 17, 2010

खुस्नासीबी

बसते थे अंधेरो में , अदात न थी उजालो की,
पर जब से रूबरू हुआ हूँ तेरे नूर से ,
शिकायत सी हो गयी है हमे अंधेरो से..

इल्म है इसका, न ठहरेंगे कहीं इस नूर में,
बहा देगा इसका हर कतरा टुकड़ा टुकड़ा कर मुझे,
शिकायत नहीं, की तेरे नूर में मिल जाना खुस्नासीबी मेरी होगी...

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