बसते थे अंधेरो में , अदात न थी उजालो की,
पर जब से रूबरू हुआ हूँ तेरे नूर से ,
शिकायत सी हो गयी है हमे अंधेरो से..
इल्म है इसका, न ठहरेंगे कहीं इस नूर में,
बहा देगा इसका हर कतरा टुकड़ा टुकड़ा कर मुझे,
शिकायत नहीं, की तेरे नूर में मिल जाना खुस्नासीबी मेरी होगी...
पर जब से रूबरू हुआ हूँ तेरे नूर से ,
शिकायत सी हो गयी है हमे अंधेरो से..
इल्म है इसका, न ठहरेंगे कहीं इस नूर में,
बहा देगा इसका हर कतरा टुकड़ा टुकड़ा कर मुझे,
शिकायत नहीं, की तेरे नूर में मिल जाना खुस्नासीबी मेरी होगी...
No comments:
Post a Comment