Saturday, February 6, 2010

न जा कहीं दर्द मेरे छोड़ कर मुझे ...

न जा कहीं दर्द मेरे छोड़ कर मुझे ,
यूँ  दिल अकेला रह न पायेगा ,
आदत हो गयी है तेरी तुझे क्या पता ,
बस एक पल और जी लूं तुझे ,
शायद चैन आये मुझे  ...

क्यूँ नहीं सहमी सी आँखे अब ,
क्यूँ  होठ मांगते नहीं दुआ ,
तड़पता क्यूँ नहीं अब जिन्दा एहसासों से ,
क्यूँ डर अब लगता नहीं ..
क्या दर्द मेरा मुझे बहका रहा ...

मांगी थी हर लम्हा दुआ ,
बस तेरे वास्ते खुदा से ,
लेकिन खो गया प्यार कहीं ,
और मेरे जीने का एहसास ,
तेरे खोने के ख्याल में  ...

दूंदता रहा तुझे हर परछाई के पीछे ,
निचोड़ कर देखा इस दिल को भी ,
तेरे एक निशान के लिए ,
जला दिया हर एक याद को ,
रोशन करने के लिए जुदाई की रात को ,
थोड़ी पनाह तो मिली पर रहत नहीं ...

न जा कहीं दर्द मेरे छोड़ कर मुझे ,
यूँ  दिल अकेला रह न पायेगा ,
तेरे हर ख्याल पे लिखी थी रुबाई मैंने ,
पर रंग उसमे नहीं थे ,कशिश भी नहीं ,
बना कर खुद को कलम डुबाया दर्द में ,
तो हर लब्ज़ नज़्म बन गया ,

न जा कहीं दर्द मेरे छोड़ कर  मुझे ,
यूँ  दिल अकेला रह न पायेगा ,
अभी होश मेरा मरा नहीं ,
जिंदा है पहरे में , तेरी याद के ...
बस न जा कहीं दर्द मेरे छोड़ कर मुझे ,
यूँ दिल अकेला रह न पायेगा ..

Wednesday, February 3, 2010

आशिक चांदनी का

जी चाहता है झगड़ लूं सूरज से ,
की न जा आज सोने और जगा रहे ये भी सारी रात ,
की हूँ मैं आशिक चांदनी का ,
और रातभर ये चाँद करता है बदनाम मुझे ,
कल जो उसे कोसा तो बादलो ने भी सिफारिश की ,
और तब से छुपा लेते हैं उसे ,
और दीवाना मैं रह जाता हूँ दूंदता, चांदनी के निशान,
हाँ कभी कोई तारा इशारा करता है , मगर डर डर कर ,
देखो उसको भी दर्द आया मेरी हालत पर ,
और अभी तक शायद जाना नहीं तुमने ,
ये ओस की बूंदे नहीं बिखरी होती हर जगह हर सुबह ,
ये आंसू हैं चांदनी के जो वो मेरे लिए बहती है ...