हो गए खुद से अजनबी , तुझे जानने की कोशिस में,
कभी महफ़िल की चमक थे हम , आज महफ़िल में हँसी का सामान हो गए ,
खुद को खो कर हम ,
कभी महफ़िल की चमक थे हम , आज महफ़िल में हँसी का सामान हो गए ,
खुद को खो कर हम ,
सवाल फिर भी यही है
के कैसे कोई अनजाना भा गया इतना
की खुद को भूलने पर मजबूर हो गए हम ...
No comments:
Post a Comment