Here is the compiled collection from this August . It is inspired from some old memories and some stupid incidents and some nice coincidences...
पतंग सा दिल मेरा
उडती पतंग सा दिल मेरा ,
लहराता है यूँ ही पर बंधा बंधा सा ,
काशिस है कभी, कभी है सुकून ,
कभी घबराता है झोंको में ,
तो कभी गुम जाता है किसी बादल के पीछे
कभी उभरता है सहमा हुआ फिर गुम जाने के लिए ,
तो कभी कोशिस करता है नापने की अपनी ही उड़ान को
अब फिर एक नया तकाजा है
बेफिक्र है पर छुपा हुआ कोई दर्द सा कहीं तो ,
चल चला मौज में लेकिन ,
बेफिक्र सब धागों से
दिल मेरा अब कटी पतंग सा ...
लहराता है यूँ ही पर बंधा बंधा सा ,
काशिस है कभी, कभी है सुकून ,
कभी घबराता है झोंको में ,
तो कभी गुम जाता है किसी बादल के पीछे
कभी उभरता है सहमा हुआ फिर गुम जाने के लिए ,
तो कभी कोशिस करता है नापने की अपनी ही उड़ान को
अब फिर एक नया तकाजा है
बेफिक्र है पर छुपा हुआ कोई दर्द सा कहीं तो ,
चल चला मौज में लेकिन ,
बेफिक्र सब धागों से
दिल मेरा अब कटी पतंग सा ...
पीले से वो कागज़
कभी हुआ है इतेफाक ऐसा ,
किसी पुरानी किताब के वो पीले से कागज़ ,
एक गीली सी शाम में ,
यूँ बिखर गए ,
हर पन्ना चुभे कांच सा ,
फीकी सी स्याही बहते दर्द सा बन जाये,
रिश्ते कुछ बंद किताब तो बन जाते हैं ,
पर किसी मौसम में यूँ ही फिर कुछ धुंधले पन्ने ,
जिनपे लिखा नहीं जा सकता ऐसे कोरे कागज़ बन जाते हैं ...
एक गीली सी शाम में ,
यूँ बिखर गए ,
हर पन्ना चुभे कांच सा ,
फीकी सी स्याही बहते दर्द सा बन जाये,
रिश्ते कुछ बंद किताब तो बन जाते हैं ,
पर किसी मौसम में यूँ ही फिर कुछ धुंधले पन्ने ,
जिनपे लिखा नहीं जा सकता ऐसे कोरे कागज़ बन जाते हैं ...
13-Aug-2010
बादल आवारा सा
जल चुकी हो शमा मेरी उमीदों की ,
फिर ये गुनगुनी शाम आई ,
पिघलते पिघलते याद तेरी दिल पे जम गयी ,
और सिमिटी जैसे वो आखरी किरण शाम की ,
मेरी हँसी भी बेईम्मान हो चली
किस बहाने से उसको बहलाओं मैं ,
की चाहत है तेरी इबादत की मुझे ,
पर कैसे मुमकिन है ये ,
की मैं तो हूँ एक बादल आवारा सा ...
फिर ये गुनगुनी शाम आई ,
पिघलते पिघलते याद तेरी दिल पे जम गयी ,
और सिमिटी जैसे वो आखरी किरण शाम की ,
मेरी हँसी भी बेईम्मान हो चली
किस बहाने से उसको बहलाओं मैं ,
की चाहत है तेरी इबादत की मुझे ,
पर कैसे मुमकिन है ये ,
की मैं तो हूँ एक बादल आवारा सा ...
16-Aug-2010
आवारा तूफ़ान
उडता जा रहा दीवाना सा मैं ,
बहारो में कहीं ,
पीछा कर रहा हूँ शायद ,
किसी खुआब का ,
कहाँ थमेगा ये सिलसिला ,
कोई नहीं जनता नहीं ,
और जानेगा भी कैसे ,
आवारा तूफान को थमते देखा है कभी ...
बहारो में कहीं ,
पीछा कर रहा हूँ शायद ,
किसी खुआब का ,
कहाँ थमेगा ये सिलसिला ,
कोई नहीं जनता नहीं ,
और जानेगा भी कैसे ,
आवारा तूफान को थमते देखा है कभी ...
19-Aug-२०१०
भूली हुई किताब
देखा है लिखा हुआ किसी किताब के पहले पन्ने पर ,
एक आयत की तरह नाम उनका ,
बस वो कतरा हुआ कागज़ है बचा ,
बंद कर वो किताब भूल गया हूँ मैं ...
एक आयत की तरह नाम उनका ,
बस वो कतरा हुआ कागज़ है बचा ,
बंद कर वो किताब भूल गया हूँ मैं ...
31-Aug-2010